क्या मसीहियों को ‘प्रभु का दिन’ को विशेष दिन मानने की आवश्यकता है ?

Posted byHindi Editor July 29, 2025 Comments:0

(English version: Are Christians Required To Keep The Lord’s Day?)

पिछले लेख में हमने सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में से देखते हुए, यह प्रश्न पूछा और उसका उत्तर दिया कि, “क्या मसीहियों को सब्त के नियम का पालन करने की आवश्यकता है ?” उस लेख का निष्कर्ष यह था कि नई वाचा के अंतर्गत रहने वाले मसीहियों को सप्ताह के सातवें दिन अर्थात शनिवार को सब्त के दिन के रूप में मानने की आवश्यकता नहीं है | एक ऐसा निष्कर्ष किसी व्यक्ति को तर्कसंगत रूप से मसीहियों और रविवार ( जिसे प्रभु का दिन भी कहा जाता है ) के मध्य के संबंध के बारे में पूछने के लिए प्रेरित करेगा | क्या इसे विशेष दिन मानने की अपेक्षा हमसे की जाती है ? क्या ऐसी कोई आज्ञा है ?

संक्षिप्त उत्तर यह है : हालाँकि मसीहियों को किसी व्यवस्था का पालन करने के भाव से प्रभु के दिन को विशेष मानने की आज्ञा नहीं दी गई है, तौभी बाईबल और कलीसियाई इतिहास में पाये जाने वाले आरंभिक कलीसिया के उदाहरण हमें बुलाहट देते हैं कि प्रभु और उसके लोगों के प्रति प्रेम के भाव में होकर हमें प्रभु के दिन के नियम का पालन करना चाहिए | दूसरे शब्दों में कहें तो, यह कर्मकाण्डवाद नहीं परन्तु प्रेम है जो हमें विश्वासियों के एक देह के रूप में प्रभु के दिन उसकी आराधना करने के लिए प्रेरित करता है |  

यह लेख उपरोक्त विचार का समर्थन करेगा |

क ) बाईबल से उदाहरण 

नीचे स्वयं बाईबल से ही 6 उदाहरण दिए गये हैं जिनमें सप्ताह के प्रथम दिन अर्थात रविवार को ( जिसे प्रभु का दिन भी कहा जाता है )  सामूहिक आराधना के दिन के रूप में प्राथमिकता दी गई है | 

1. प्रभु यीशु मसीह रविवार को मरे हुओं में से जी उठे :

मत्ती हमें बताता है, 1 सब्त के दिन के बाद सप्ताह के पहिले दिन पह फटते ही मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम कब्र को देखने आईं | 2 और देखो एक बड़ा भुईंडोल हुआ, क्योंकि प्रभु का एक दूत स्वर्ग से उतरा, और पास आकर उसने पत्थर को लुढ़का दिया, और उस पर बैठ गया |  … 5 स्वर्गदूत ने स्त्र्यिों से कहा, कि तुम मत डरो: मै जानता हूँ कि तुम यीशु को जो क्रूस पर चढ़ाया गया था ढूंढ़ती हो | 6 वह यहाँ नहीं है, परन्तु अपने वचन के अनुसार जी उठा है; आओ, यह स्थान देखो, जहाँ प्रभु पड़ा था ( मत्ती 28:1 – 2, 5-6 ) | लूका 24:1 – 7 भी यही बात बताता है | यीशु मसीह मरे हुओं में से रविवार को जी उठे |

2. पुनरुत्थित प्रभु का अपने चेलों से प्रथम मुलाक़ात रविवार को हुआ |

लूका 24:13 – 15 में इम्माऊस गाँव जा रहे दो चेलों से यीशु मसीह की मुलाक़ात को बताया गया है, 13 देखो, उसी दिन उन में से दो जन इम्माऊस नाम एक गांव को जा रहे थे, जो यरूशलेम से कोई सात मील की दूरी पर था | 14 और वे इन सब बातों पर जो हुईं थीं, आपस में बातचीत करते जा रहे थे | 15 और जब वे आपस में बातचीत और पूछताछ कर रहे थे, तो यीशु आप पास आकर उन के साथ हो लिया |

जब यीशु मसीह ने उनसे बातें की और बाद में रोटी तोड़ने के लिए भी जब वह सहभागी हुआ तो उनकी आँखें खुल गईं और उन्होंने यीशु को पहचान लिया, और ये शब्द उनके मुँह से निकले, उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हम से बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई ? ( लूका 24:32 ) | यीशु मसीह ने इन दो लोगों के साथ पुराना नियम का एक छोटा सा बाईबल अध्ययन किया जो कि एक महान अध्ययन रहा होगा ! 

लूका यह भी बताता है कि उस रविवार को यीशु न केवल इन 2 मनुष्यों पर प्रगट हुए थे परन्तु साथ ही साथ 11 प्रेरितों की बहुलता पर भी प्रगट हुए थे : 36 वे ये बातें कह ही रहे ये, कि वह आप ही उन के बीच में आ खड़ा हुआ; और उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले |”

3. कलीसिया का जन्म रविवार को हुआ :

प्रेरितों के काम का अध्याय 2 हमें बताता है कि जिस दिन कलीसिया का जन्म हुआ उस दिन क्या हुआ | प्रथम आयत हमें इस बात का एक सुराग देता है कि यह सप्ताह का कौन सा दिन था, “जब पिन्तेकुस का दिन आया, तो वे सब एक जगह इकट्ठे थे” (प्रेरितों के काम 2:1 ) | फसह ( जो कि शुक्रवार संध्या से शनिवार संध्या तक होता था ) के 50 दिन के पश्चात पिन्तेकुस का दिन आता था | इस प्रकार 50 दिन के पश्चात रविवार का दिन आता था – उसी दिन कलीसिया का जन्म हुआ |

4. आरंभिक कलीसिया आराधना के लिए रविवार को इकट्ठा होती थी :

आरंभ में, आरंभिक कलीसिया आराधना के लिए प्रतिदिन मिला करती थी ( प्रेरितों के काम 2:46 ) | परन्तु, थोड़े समय पश्चात, वे नियमित रूप से रविवार को मिलने लगे | प्रेरितों के  काम 20:7 हमें यह अभिलेख देता है, “सप्ताह के पहिले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए |”

5. भेंट रविवार को लिए जाते थे जिस दिन कलीसिया इकट्ठी होती थी :

यरूशलेम में रहने वाले गरीब विश्वासियों के लिए इकट्ठा किए जाने वाले भेंट के संबंध में कुरिन्थ के विश्वासियों को लिखते हुए पौलुस इन बातों को कहता है: 2 सप्ताह के पहिले दिन तुम में से हर एक अपनी आमदनी के अनुसार कुछ अपने पास रख छोड़ा करे, कि मेरे आने पर चन्दा न करना पड़े |” ऐसा प्रतीत होता है कि भेंट रविवार को एकत्रित की जाती थी जब कलीसिया इकट्ठी होती थी |

6. बाईबल का लेखन रविवार को पूर्ण हुआ :

प्रकाशितवाक्य बाईबल का अंतिम पुस्तक है | इस पुस्तक की विषय – सामग्री लगभग ईसवी सन 95  में दूसरी कलीसियाओं तक पहुँचाने के लिए यूहन्ना को दिया गया था जो कि 12 प्रेरितों में से एक था | रोचक बात यह है कि प्रभु यीशु ने इन प्रकाशनों को यूहन्ना को रविवार को दिया जो कि उस समय तक ‘प्रभु का दिन’ नाम से पहचाना जाने लगा था | 

प्रकाशितवाक्य 1:9-11 में लिखा है, 9 मैं यूहन्ना जो तुम्हारा भाई, और यीशु के क्लेश, और राज्य, और धीरज में तुम्हारा सहभागी हूं, परमेश्वर के वचन, और यीशु की गवाही के कारण पतमुस नाम टापू में था |

10 कि मैं प्रभु के दिन आत्मा में आ गया, और अपने पीछे तुरही का सा बड़ा शब्द यह कहते सुना |

11 कि जो कुछ तू देखता है, उसे पुस्तक में लिख कर सातों कलीसियाओं के पास भेज दे, अर्थात इफिसुस और स्मुरना, और पिरगमुन, और थुआतीरा, और सरदीस, और फिलेदिलफिया, और लौदीकिया में |” 

इस प्रकार हम बाईबल से 6 उदाहरणों को देखते हैं जो सामूहिक आराधना के दिन के रूप में रविवार को प्राथमिकता देने की आवश्यकता को दर्शाता है |

बाईबल के इन 6 उदाहरणों के साथ ही साथ हमारे पास आरंभिक कलीसियाई अगुओं के लेखों के रिकार्ड भी हैं जो कि आरंभिक कलीसिया को रविवार के दिन अर्थात प्रभु के दिन आराधना करते हुए दिखाती है | 

ख) कलीसियाई इतिहास के उदाहरण :

1. जस्टिन मार्टर ( एक आरंभिक कलीसियाई अगुवा ) के उद्धरण :

“और उस दिन जिसे रविवार कहते हैं, शहर या गाँव के सब रहने वाले एक स्थान में इकट्ठे होते हैं, और समय जितनी अनुमति देता है उसके अनुसार प्रेरितों के संस्मरण या भविष्यद्वक्ताओं के लेख पढ़े जाते हैं … रविवार वह दिन है जब हम सब हमारी आम सभा को रखते हैं क्योंकि यह सप्ताह का प्रथम दिन है जिसमें परमेश्वर ने अन्धकार और पदार्थ में परिवर्तन लाते हुए इस संसार की रचना की और हमारा उद्धारकर्ता यीशु मसीह इसी दिन मरे हुओं में से जी उठा |” ( जस्टिन मार्टर का प्रथम प्रत्युत्तर, मसीहियों की साप्ताहिक आराधना, अध्याय 68, ईसवी सन् 158 ) |

2. फिलिप शाफ़ ( कलीसिया का इतिहास लिखने वाले एक लेखक ) के उद्धरण :

“नि: संदेह मसीह के पुनरुत्थान के स्मरण में ‘प्रभु के दिन’ का उत्सव मनाने का कार्य प्रेरित – युग से चला आ रहा है | द्वितीय सदी की कलीसियाओं में किसी भी ऐसे सार्वभौमिक धार्मिक अभ्यास को तर्कसंगत रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है जो प्रेरितों के पूर्व अभ्यास से न हो | कहीं कोई असहमति के स्वर नहीं हैं | प्रेरितों के पश्चात मसीही लेख लिखने वाले सर्वाधिक आरंभिक लेखकों, जैसे बरनबास, इग्नेशियस, और जस्टिन मार्टर की गवाहियों द्वारा इस रिवाज की पुष्टि हुई है |” ( मसीही कलीसिया का इतिहास, ग्रन्थ 1, पृष्ठ 201 – 222 ) | 

शाफ़ आगे लिखते हैं, “… स्वयं नया नियम से यह प्रगट होता है कि रविवार को आराधना के दिन के रूप में और एक ऐसे दिन के रूप में माना जाता था जिसमें पुनरुत्थान को विशेष रूप से स्मरण किया जाता था, उस पुनरुत्थान को जिसके द्वारा छुटकारे का कार्य पूर्ण हुआ | द्वितीय सदी में रविवार के दिन को सार्वभौमिक और अविवादित रूप से विशेष दिन मानने के अभ्यास को केवल इसी तर्क से समझाया जा सकता है कि इसकी जड़ें प्रेरितों के द्वारा किये जाने वाले अभ्यास में हैं |” ( पृष्ठ 478 – 479 ) | 

उपरोक्त उद्धरणों के अतिरिक्त इग्नेशियस ने ( जो कि यूहन्ना का चेला और अन्ताकिया का बिशप था ) द्वितीय सदी के आरंभिक चरण में लिखा, “मसीह का प्रत्येक मित्र ‘प्रभु के दिन’ को एक उत्सव, पुनरुत्थान – दिवस, समस्त दिनों की रानी और मुखिया के रूप में मनाये |” 

चूँकि हमारे पास बाईबल और आरंभिक कलीसियाई अगुवों के लेखों से उदाहरण मौजूद हैं, इसलिए मैं समझता हूँ कि हम सुरक्षित रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि प्रभु के दिन एक समूह के रूप में आराधना करने का एक विशेष महत्व है | 

समापन विचार :

इब्रानियों 10:24 – 25 कहता है, 24 और प्रेम, और भले कामों में उकसाने के लिये एक दूसरे की चिन्ता किया करें | 25 और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो | यदि हम नियमित रूप से इकट्ठे न हों तो हम कैसे एक दूसरे को उकसा और प्रोत्साहित कर सकते हैं ? 

कुलुस्सियों 3:16 कहता है,“मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ | इस आज्ञा का पालन भी एक साथ इकट्ठे होकर ही किया जा सकता है| 

यह बात सही है कि ये आयतें खुलकर यह नहीं कहती हैं कि केवल रविवार को इकट्ठे होकर ही इन आज्ञाओं का पालन किया जा सकता है | परन्तु यह बात भी सही है कि हम प्रत्येक दिन इकट्ठे नहीं हो सकते हैं | क्या हम हो सकते हैं ? इसीलिए, हम कम से कम सप्ताह में एक ठहराए हुए दिन अर्थात प्रभु के दिन में इकट्ठे होकर उन विश्वासियों के उदाहरण का अनुसरण क्यों न करें जो हमसे पहले इस राह पर चले हैं ?

कोई इस लेख को पढ़ने के बाद भी रविवार को इकट्ठे होने की आवश्यकता के विरोध में तर्क – वितर्क कर सकता है | ऐसे किसी भी तर्क – वितर्क के लिए मेरा उत्तर सरल है : अन्य विश्वासियों के साथ रविवार को आराधना करने का प्रतिरोध करने का वास्तविक कारण क्या है ? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि यह आपके दूसरे कार्यों में बाधा डालता है ? क्या यह किसी स्थानीय कलीसिया का अंग बनने की आपकी अनिच्छा के कारण है ? क्या आपका कोई बुरा अनुभव आपको कलीसिया जाने से रोकता है ? मैं आपत्ति जताने वालों से निवेदन करता हूँ कि वे अपने हृदय को जाँचें और आपत्ति जताने से पहले पवित्रशास्त्र के प्रकाश में दीनता से अपने कारणों का परीक्षण करें |

मसीहियों को अपने आप में ही एकाकी जीवन नहीं बिताना है | एक ऐसे युग और समय में जब विश्वासी होने का दावा करने वाले लोग अपनी स्थानीय कलीसियाओं को कम और बहुत कम प्राथमिकता देते हुए जान पड़ते हैं और उसी समय उनके पास अन्य गतिविधियों के लिए ( जिसमें ऐसी सेवकाईयाँ भी सम्मिलित हैं जिससे कलीसिया को सहायता तो मिलती है परन्तु जो कलीसिया के बाहर से संचालित होती हैं ) अत्याधिक समय होता है, हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम बाईबल की ओर वापस लौटें जो हमें कलीसिया के प्रति एक उच्चतर समर्पण की बुलाहट देता है, उस कलीसिया के प्रति जो स्वयं यीशु मसीह के लहू से खरीदी गई है ( प्रेरितों के काम 20:28 ) ! 

विश्वासियों को प्रभु के दिन एक साथ मिलने का लक्ष्य रखना चाहिए और ऐसा उन्हें कर्मकांडवादी मन से नहीं अपितु प्रभु और उसके लोगों के प्रति प्रेम के कारण करना चाहिए | सप्ताह में एक दिन और वह भी 2 घंटे या उससे थोड़ा कम या अधिक समय के लिए इकट्ठा होना किसी भी विश्वासी के लिए कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए – हालाँकि दुःख की बात है कि विश्वासी होने का दावा करने वाले कई लोग अपनी रविवारीय उपस्थिति में अत्याधिक अनियमित हैं | यह सचमुच में दुखद है ! हमेशा यह पूछने के बनिस्बत कि, “कलीसिया जाने से मुझे क्या लाभ होगा ?”, यदि विश्वासीगण यह पूछें कि, “मैं कलीसिया जाकर क्या लाभ पहुँचा सकता हूँ ?” , तो यह कलीसिया में आमूल – चूल परिवर्तन लायेगा |  क्या ऐसा एक दृष्टिकोण जिसमें हम दूसरों के लिए एक आशीष बन जाना चाहते हैं, न केवल प्रभु के प्रति प्रेम का वरन साथ ही साथ अन्य लोगों के प्रति प्रेम का भी प्रदर्शन नहीं करता है ? 

अगले लेख  में उन समस्याओं के बारे में चर्चा होगी जो विश्वासियों को प्रभु के दिन आराधना करने से रोकती हैं और उसके बाद के लेख  में इस बात पर चर्चा होगी कि प्रभु की आराधना ‘उसके दिन’ में करने के लिए प्रभावकारी तरीके से योजना कैसे बनायें | 

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