प्रभु के दिन कलीसिया जाने से रोकने वाली आम समस्याएँ
(English version: Common Problems That Hinder Going To Church On The Lord’s Day)
पिछले लेख में यह प्रश्न पूछा गया कि, “क्या मसीहियों को ‘प्रभु का दिन’ को विशेष दिन मानने की आवश्यकता है ?” और इसका उत्तर कुछ इस प्रकार से दिया गया : मसीही लोग ‘प्रभु का दिन’ को विशेष दिन मानते हैं – किसी विशेष नियम का पालन करने के भाव से नहीं – बल्कि प्रभु और उसके लोगों के प्रति प्रेम के कारण | यह कर्मकाण्डवाद नहीं परन्तु प्रेम है जो एक विश्वासी को प्रभु के लोगों के साथ मिलकर उसकी आराधना “प्रभु के दिन” करने के लिए प्रेरित करता है |
प्रभु के दिन कलीसिया जाने के नियमित आदत को बनाये रखने के संबंध में बात करना आसान है परन्तु ऐसा करना अपेक्षाकृत एक कठिन कार्य है | यह लेख कुछ ऐसी आम समस्याओं को देखेगी जो लोगों को प्रभु के दिन ऐसा करने से रोकती हैं | अगला लेख उन प्रायोगिक सुझावों के बारे में होगा जिनसे विश्वासियों को “प्रभु के दिन” के साथ परमेश्वर को महिमा देने वाली रीति के अनुसार व्यवहार करने में सहायता मिलेगी |
प्रभु के दिन नियमित उपस्थिति की समस्या कहने से मेरा क्या तात्पर्य है यह समझने के लिए इस उपस्थिति – आंकड़ों को देखिए | एक वर्ष में 52 सप्ताह होते हैं | मान लीजिए कोई व्यक्ति कलीसिया आने में प्रति महीने 1 बार चूक जाता है; इससे वह एक वर्ष में लगभग 12 रविवार को अनुपस्थित रहेगा | इससे उस वर्ष के लिए उसकी अनुपस्थिति का प्रतिशत 23% हो जाता है | अब आईए आगे बढ़ते हैं और मान लेते हैं कि एक व्यक्ति प्रति महीने 2 रविवार अनुपस्थित रहता है | इसका परिणाम यह होगा कि वह प्रति वर्ष 24 रविवार को अनुपस्थित रहेगा जिससे अनुपस्थिति प्रतिशत 46% हो जाता है |
क्या आप समस्या को समझ पा रहे हैं ? हमारी अनुपस्थिति को ऐसे देखना जैसे यह कोई बड़ी बात न हो तब तक अत्यंत आसान लगता है जब तक कुछ यथार्थपूर्ण संख्यायें हमें घूरती हुई न दिखाई दें | मैं और अधिक विवरण देना पसंद नहीं करूँगा हूँ ताकि इस लेख के कुछ पाठक असहज होने से बच सकें ( जबकि ऐसा करना एक अर्थ में कोई बुरी बात नहीं होती ! ) | मैं पूरी रीति से समझता हूँ कि सिद्ध उपस्थिति, सच्ची आत्मिकता का न तो लक्ष्य है और न ही एक संकेत | फरीसी लोग, उपस्थिति के मामले में सिद्ध थे परन्तु उनका हृदय परमेश्वर से दूर था | परन्तु, उपस्थिति अवश्य ही एक सीमा तक हमारी प्राथमिकताओं को बताती है और बताती है कि हम प्रभु के दिन को उसके दिन के रूप में महत्व दे रहे हैं कि नहीं !
इन परिचयात्मक विचारों के साथ आईए उन आम समस्याओं को देखें जो एक व्यक्ति को नियमित कलीसिया आने से रोकती हैं | इस विषय को सरल बनाने के उद्देश्य से मैंने इसे दो व्यापक वर्ग में बाँटा है : लाभ और मजा |
मेरे आगे बढ़ने से पहले, एक घोषणा : यह लेख उन लोगों पर लागू नहीं होता है जो ऐसे कारणों से जो कि उनके नियंत्रण से बाहर हैं कलीसिया जाने में सचमुच में असमर्थ हैं ( उदाहरण के लिए, स्वास्थ्यगत कारण ) |
1. लाभ
चीनी लोगों की एक प्राचीन – कथा है | वे एक व्यक्ति के बारे में बताते हैं जो एक दिन बाज़ार गया और उसके पास सात सिक्कों की एक माला थी | उसने एक भिखारी को देखा और उसने उसे उन सिक्कों में से छः सिक्के दे दिए और सातवें सिक्के को अपनी जेब में रख लिया | परन्तु उस भिखारी ने जो कि एक जेबकतरा भी था, उस सिक्के को चुरा लिया और अपने लिए रख लिया | हमारे इस आधुनिक समय का वर्णन करने के लिए एक उपयुक्त दृष्टांत ! हमारे प्रभु ने काम करने के लिए हमें छः दिन दिए हैं परन्तु कई हैं जो कहते हैं, “सही बात है, और मैं सातवें दिन को भी चुरा लूँगा और उसे अपने लिए उपयोग करूँगा |”
मसीही होने का दावा करने वाले कई लोगों के लिए प्रभु का दिन भी अन्य कार्य – दिवस के समान ही होता है | मैं ऐसी किसी परिस्थिति के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ जहाँ काम करना मजबूरी हो | यहाँ तक कि आरंभिक कलीसिया में भी कई विश्वासियों को जो गुलाम थे रविवार को भी कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता था | मैं पूरी रीति से समझता हूँ कि ऐसे भी समय आते हैं जब समर्पित मसीहियों को भी कुछ रविवार काम करने होते हैं क्योंकि उनके व्यवसाय की प्रवृत्ति ही ऐसी होती है |( ऐसी परिस्थिति में भी वह प्रार्थना कर सकता है और प्रभु से परिस्थितियों को बदलने के लिए निवेदन कर सकता है | अपने समय में परिस्थिति को परिवर्तित करने की सामर्थ परमेश्वर में है | )
मैं केवल उन समयों के बारे में बात कर रहा हूँ जब एक व्यक्ति के पास कार्य नहीं करने का विकल्प रहता है तौभी वह कार्य करने का चुनाव करता है और परिणामस्वरूप कलीसिया में अनुपस्थित रहता है | ऐसी परिस्थितियों में भी वह व्यक्ति प्रभु को पुकार सकता है कि वह उसकी सहायता करे कि वह उन सांसारिक वस्तुओं को ढूँढने की परीक्षा पर जय पा सके जिसके कारण कलीसिया में अनुपस्थित रहना पड़ता है | यदि उसके दिन में उसकी महिमा करने के लिए हमारा मन लगा हुआ है तो प्रभु सहायता करेंगे | यदि हम उन तरीकों को “हाँ” कहने का चुनाव करते हैं जो प्रभु को महिमा देते हैं तो कुछ आर्थिक नुकसान या व्यवसाय की सीढ़ी को ऊँचा न कर पाने जैसे कुछ अन्य नुकसान झेलने पड़ सकते हैं | परन्तु, क्या जब बात उस यीशु मसीह का आदर करने की आये जिसने हमारे लिए अपना सब कुछ दे दिया तो हमें ऐसे किसी नुकसान की गणना भी करनी चाहिए ?
साथ में यह भी बता दूँ कि परीक्षा के लिए पढ़ने के कारण रविवार की सभा में अनुपस्थित रहने वाले विद्यार्थी भी कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे ‘प्रभु के दिन’, प्रभु का अनादर होता है | ऐसा कैसे ? यदि हमें प्रभु यीशु से ऊपर अपने परिवार को भी नहीं रखना है ( लूका 14:26 ) तो फिर क्या हम किसी परीक्षा को उसके ऊपर रख सकते हैं – जो हमें अध्ययन करने और परीक्षा लिखने का अवसर देता है ? कलीसिया न जाने के स्थान पर एक व्यक्ति को उसके दिन उसके लोगों के साथ आराधना करने के लिए आने के द्वारा विश्वास में होकर प्रभु की आज्ञा मानने का प्रयास करना चाहिए | प्रार्थनापूर्वक और प्रभावशाली रूप से शेष अन्य समयों को अध्ययन के लिए उपयोग करने के द्वारा एक – दो घंटे निकाले जा सकते हैं | यदि आराधना करने के लिए कलीसिया आने से परीक्षा में थोड़े – बहुत अंक कम आते हैं, तो आने दो ! यह तो आज्ञाकारिता की कीमत है ! यह एक अच्छी और सही बात है कि छोटी उम्र से ही यह सीखा जाए कि यीशु को सारी बातों के ऊपर रखा जाना चाहिए !
इस मामले में पालकों को भी अपने बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए और यदि अकादमिक रूप से बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए प्रभु के दिन कलीसिया आने में बाधा आती है तो ऐसा करने के लिए उनको धक्का देकर उनके लिए उन्हें ठोकर का कारण नहीं बनना चाहिए | बच्चे आदत के अनुसार जीते हैं | माताओं और पिताओं, आप उनमें क्या आदत पैदा कर रहे हैं ? आईए स्वयं को मूर्ख न बनायें : आज जो हम बोते हैं काफी समय पश्चात हम वही काटेंगे ! इसके अलावा, यदि पालक के रूप में हम आराधना के ऊपर कार्य को प्राथमिकता देते हैं तो हम अपने बच्चों को क्या संदेश दे रहे हैं ?
रविवार को कलीसिया आने से रोकने वाली पहली समस्या – लाभ को देखने के पश्चात आईए दूसरी समस्या की ओर बढ़ें |
2. मजा
प्रभु के दिन लोगों को कलीसिया आने से रोकने वाली दूसरी मुख्य समस्या है, मजा करने में मगन रहना – विशेषरूप से बात करें तो रविवार को होने वाले खेलकूद और अन्य आनंददायी गतिविधियों में मगन रहना | इसमें सत्रकालीन गतिविधियों में बच्चों का दाखिला करवाना भी सम्मिलित है जिससे उनका लम्बे समय तक कलीसिया आना असंभव हो जाता है और ऐसा साल दर साल चलता है ! ऐसे निर्णय प्रभु को प्रसन्न करने वाले और उसे आदर देने वाले कैसे हो सकते हैं ?
कोई कह सकता है, “आखिरकर, मेरे पास मात्र वही एक दिन तो है | थोड़ा मजा करने और आराम करने में ऐसी भी क्या समस्या है ? मेरे बच्चे अपने खेलकूद को पसंद करते हैं, फिर उनका क्या होगा ? मैं खेलकूद में उनके विकास को कैसे बाधित कर सकता हूँ ? हम कर्मकाण्डवादी नहीं हैं | परमेश्वर, अनुग्रह का परमेश्वर है और हम पुराना नियम समय के समान व्यवस्था की आधीनता में नहीं जीते हैं | फिर ऐसा भी नहीं है कि मैं कार्य कर रहा हूँ | मैं इस बात का ध्यान रखता हूँ कि मैं रविवार को कार्य न करूँ | रविवार को कोई भी परिश्रम नहीं !”
हाँ, हम कर्मकाण्डवादी नहीं हैं | और परमेश्वर सचमुच में “सारे अनुग्रह का दाता है” ( 1 पतरस 5:10 ) | यह भी उतना ही सही है कि हम “व्यवस्था के नहीं परन्तु अनुग्रह के अधीन हैं” ( रोमियों 6:14 ) | परन्तु जो लोग प्रभु के दिन कार्य करने से स्वयं को दूर रखते हैं परन्तु मजा करने में मगन रहते हैं उनके साथ एक दुखद बात यह है : उन्होंने मात्र एक मूरत को दूसरे मूरत से बदल दिया है ( अर्थात, कार्य के स्थान पर मजा ) क्योंकि अंतिम परिणाम तो वही है : रविवार के दिन प्रभु के लोगों के साथ मिलकर प्रभु की आराधना नहीं करना !
मैं बिल्कुल इस बात को समझता हूँ कि पालकगण अपने बच्चों के लिए अच्छे कार्य करना चाहते हैं | मैं भी एक पालक हूँ ! लेकिन आईए स्वयं के प्रति ईमानदार रहें : क्या प्रभु को आदर देने के स्थान पर खेलकूद का चुनाव करना दान ( बच्चे ) को स्वयं दाता ( परमेश्वर ) के ऊपर रखने के समान नहीं है ? यदि हम परमेश्वर को नम्बर 2 पर रखें तो क्या परमेश्वर को अच्छा लगेगा ? हम क्या कहते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि अंत में हमारे कार्य कहीं अधिक ऊँची आवाज में बतला देते हैं कि हमारे हृदय में सचमुच में नंबर 1 कौन है !
यही बात अन्य कार्यों के लिए भी कहा जा सकता है, फिर चाहे वह पार्क जाना हो, फिशिंग करना, कैम्पिंग करना या कोई और बात जिसके कारण कोई व्यक्ति प्रभु के दिन उसके लोगों के साथ मिलकर उसकी आराधना करने से लगातार चूक जाता है | क्या इसका अर्थ यह है कि हम पार्क नहीं जा सकते, या छुट्टी लेकर एक साथ कुछ करने के लिए, आराम करने या मन को शांत करने के लिए बाहर नहीं जा सकते हैं ? बिल्कुल भी नहीं ! एक व्यक्ति एक तर्कसंगत सीमा के अन्दर रहकर इन सब कार्यों को करते हुए भी प्रभु के दिन उसके घर आने के द्वारा प्रभु का आदर कर सकता है ! यहाँ तक कि छुट्टी में बाहर जाते समय भी हम एक स्थानीय कलीसिया में जाकर अन्य विश्वासियों के साथ मिलकर प्रभु की आराधना करने का एक सच्चा प्रयास कर सकते हैं | जब हम छुट्टी पर जाते हैं तो घूमने के स्थानों की पतासाजी पहले से ही कर लेते हैं | बाईबल का सही प्रचार करने वाली किसी नजदीकी कलीसिया के साथ संगति करने के लिए कितने बार प्रयास किया जाता है ?
एक बार एक पासबान कलीसिया के एक ऐसे सदस्य से मिलने के लिए गया जो गर्मी के महीनों में अक्सर कलीसिया में अनुपस्थित रहता था | अतः, उसने उससे उसकी अनुपस्थिति का कारण पूछा | उस व्यक्ति ने, जो कि एक शौकिया गोल्फ खिलाड़ी था, बड़े हियाव के साथ उत्तर दिया, “पासबान महोदय, रविवार को मेरे कलीसिया में न होने की बात से आप परेशान न हों | मैं गोल्फ के मैदान में ही प्रभु की आराधना कर लेता हूँ |”
पासबान ने शान्ति से उत्तर दिया, “आप गोल्फ के मैदान में प्रभु की आराधना नहीं करते हैं बल्कि प्रभु के मैदान में गोल्फ की आराधना करते हैं |” तो आपने देखा, हम अपने आप से चाहे जो भी कहें परन्तु जब हम अपने मजे या अपने बच्चों के खुशी को परमेश्वर से ऊपर रखने का चुनाव करते हैं तो पूरी सच्चाई यही है कि हम स्वयं की और अपने बच्चों की आराधना करते हैं – परमेश्वर की नहीं !
यह बिल्कुल सच है कि परमेश्वर “हमारे आनंद के लिए” कई भली वस्तुओं को देता है ( 1 तीमुथियुस 6:17 ) | परन्तु जब दाता के स्थान पर दान काबिज हो जाता है, तो यह मूर्तिपूजा बन जाता है | जब प्रभु के दिन आराधना करने के रास्ते में ‘मजा’ अक्सर बाधा बने तो फिर यह एक ठोकर की चट्टान है और इसे निर्दयतापूर्वक हटाना चाहिए ! रविवार, प्रभु का दिन है और एक विश्वासी को प्रभु के दिन प्रभु के घर में उपस्थित रहने के लिए संघर्ष करना चाहिए |
यह देखना दुखद है कि मसीही होने का दावा करने वाले लोगों को प्रभु के दिन अनुपस्थित रहने पर दुःख तक नहीं होता है | कई लोगों को प्रभु का दिन बहुत ही कठिन बात जान पड़ती है | वे कहते हैं, “कलीसिया आना बहुत मुश्किल कार्य है | बहुत मेहनत करना पड़ता है |” वे इसे ऐसा बना देते हैं मानो यह कोई भारी बोझ है ! वे जब तक अपने इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ न कर दें कि जिस प्रभु ने उनके पापों के लिए अपना प्राण दिया, उस प्रभु की आराधना करने के लिए कलीसिया जाना सचमुच में कठिन है तब तक इस झूठ को दोहराते ही रहते हैं ! ऐसा एक दृष्टिकोण मलाकी के समय के याजकों का स्मरण दिलाता है ( मलाकी 1:6 – 14 ) |
अन्य दिनों की तुलना में हम प्रभु के दिन के साथ जैसा व्यवहार करते हैं वह भी एक हृदयविदारक बात है – जब बात किसी बीमारी की आये तब भी | मैं बिल्कुल भी उन समयों की बात नहीं कर रहा हूँ जब हम सचमुच में इतने बीमार हों कि कलीसिया नहीं आ सकते | ऐसे अवसरों पर यही उचित है कि घर पर रुकें और शरीर को आराम दें – उस शरीर को जो प्रभु का है | मैं केवल उन अवसरों की बात कर रहा हूँ जब यहाँ – वहाँ थोड़ा बहुत दर्द हो और हम घर में रहना पसंद करते हैं – जबकि ऐसा दर्द हमें काम करने जाने से नहीं रोकता है | हो सकता है कि कई बार दर्द शुक्रवार को आये और हम ठान लेते हैं कि रविवार को कलीसिया नहीं जाया जा सकता ! भविष्य देखने की ऐसी सामर्थ पा लेना अद्भुत है ! उसी समय मनोरंजन के दूसरे कार्यों में भाग लेने की ताकत रहती है – जैसे कि शनिवार रात को पूरे जोश और ऊर्जा के साथ पार्टी करने और देर रात तक जागने के लिए ! परन्तु, जब रविवार की सुबह आती है तो हम मानसिक एवं शारीरिक रूप से इतने बीमार हो जाते हैं कि कलीसिया नहीं जा सकते ! हमारी प्राथमिकताओं के बारे में यह क्या बताता है ?
कई वर्षों पूर्व, एक स्थानीय समाचार – पत्र को एक पासबान के द्वारा लिखा गया पत्र उपरोक्त भावना का सही ढंग से बखान करता है | उनके शब्द ये थे :
एक बीमारी है जो चेचक से भी बुरी और प्राणघातक है | यह एक ऐसी बीमारी है जिससे कलीसिया के अधिकाँश लोग पीड़ित हैं | भिन्न – भिन्न लोगों में इसके लक्षण भिन्न – भिन्न होते हैं, परन्तु इससे कभी भी ऐसा नहीं होता है कि मरीज को भूख लगना बंद हो जाए | यह बीमारी कभी भी 24 घंटे से अधिक नहीं रहती है | कभी भी किसी डॉक्टर को नहीं बुलाया जाता है | यह हमेशा आत्मा के लिए प्राणघातक सिद्ध होती है | यह बीमारी बहुत अधिक फ़ैली हुई है और इससे प्रतिवर्ष हजारों लोग नाश होते हैं | यह बीमारी उन्हें एकाएक प्रत्येक रविवार सुबह को दबोच लेती है |
शनिवार रात को कोई भी लक्षण नहीं दिखाई देते हैं | इसका आक्रमण रविवार सुबह लगभग 9 बजे होता है | सामान्यतः ऐसा होता है कि पीड़ित व्यक्ति शनिवार की रात को अच्छी नींद का आनंद उठाता है, और फिर सुबह अपना मनपसंद नाश्ता करता है परन्तु बस कलीसिया जाने के समय ही यह बीमारी उस पर एकाएक प्रचंडता के साथ आ गिरती है | सुबह की सभा समाप्त होने तक इस बीमारी का असर रहता है और फिर ऐसा लगता है कि इसका असर लगातार घट रहा है और इतना घट जाता है कि वह दोपहर को अच्छा भारी भोजन लेता है | दोपहर पश्चात पीड़ित व्यक्ति को बहुत अच्छा महसूस होने लगता है और वह अक्सर बाईक से घूमने, गोल्फ खेलने या किसी अन्य प्रकार के किसी व्यायाम के लिए चला जाता है |
ऐसा प्रतीत होता है कि यह बीमारी कभी भी आँखों को प्रभावित नहीं करती है क्योंकि मरीज रविवार के अखबार को भली – भांति पढ़ते हुए आनंद उठाते हुए प्रतीत होते हैं | लगभग रात के भोजन के समय बीमारी का फिर से आक्रमण होता है जिसका असर रात्रिकालीन सभा के समाप्त होने तक बना रहता है | सोमवार सुबह वह बिस्तर से तरोताजा उठता है और फिर अगले रविवार तक उस पर बीमारी का कोई आक्रमण नहीं होता है |
इलाज : इफिसियों 5:14 की एक तगड़ी खुराक लें, “हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी”|
एक लेखक ने इस समस्या का अच्छा विवरण दिया है : “अधिकाँश लोगों के लिए, यहाँ तक कि कलीसिया के सदस्यों के लिए भी कलीसिया उनके सप्ताह की प्राथमिकता नहीं होती है | बहुत बार स्कूल, काम, खेलकूद और अन्य गतिविधियाँ कलीसिया जाने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं | वे संसार को अपने समय को व्यवस्थित करने की अनुमति देने की गलती कर बैठते हैं, उस संसार को जो सप्ताहांत को आराम करने, खेलकूद में हिस्सा लेने, देर रात तक जागने और फिर देर तक सोने के समय के रूप में देखता है | परन्तु मसीहियों के लिए रविवार सप्ताह का सरवाधिक महत्वपूर्ण दिन होना चाहिए | कलीसिया को ध्यान में रखते हुए आपको अपने कार्य, अन्य गतिविधियों, मिलन समारोहों और घूमने जाने की योजनायें बनानी चाहिए |”
प्रभु के दिन के साथ सही रीति से व्यवहार करने के द्वारा हम संसार से कहते हैं कि वे हमें निर्देश नहीं देते हैं कि हम प्रभु के दिन के साथ कैसा व्यवहार करें, परन्तु प्रभु हमें निर्देश देता है कि हम उसके दिन के साथ कैसा व्यवहार करें ! हमें यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि यह ‘प्रभु का दिन’ है | ‘प्रभु का आधा दिन’ नहीं ! हमारा विचार ऐसा नहीं होना चाहिए कि, “मैंने अपने दो घंटे प्रभु को दे दिए ! कितनी राहत मिली ! अब मैं अपने कार्यों के लिए जा सकता हूँ |” एक ऐसे दृष्टिकोण के साथ एक व्यक्ति प्रभु की आराधना सम्पूर्ण मन से कैसे कर सकता है – विशेष रूप से तब जब आँखें हमेशा घड़ी पर लगी हुई हों ? हमें सम्पूर्ण दिन को प्रभु के दिन के रूप में समझना चाहिए और हमें उसका आदर करने के लिए संघर्ष करना चाहिए |
मान लेते हैं कि प्रभु के दिन में नियमित रूप से अन्य गतिविधियों का जमावड़ा रहता है | ऐसी अवस्था में कलीसिया जाना, बाईबल पढ़ना, कोई अच्छी मसीही पुस्तक पढ़ना, प्रार्थना करना, प्रभु पर ध्यान लगाना जैसी गतिविधियाँ कहीं खो जाती हैं | परन्तु कल्पना करें कि कोई परिवार प्रभु के दिन एक साथ समय व्यतीत करता है, कुछ समय वे एक ईकाई के रूप में बाईबल पढ़ने में, प्रार्थना करने में, प्रभु की बातों पर ध्यान लगाने में व्यतीत करते हैं और एक परिवार के रूप में कलीसिया जाते हैं | क्या ही आशीषमय बात यह होगी ! ( मैं समझता हूँ कि इस लेख को पढ़ने वाले कुछ लोगों के उद्धार न पाए हुए जीवनसाथी या बड़े बच्चे हो सकते हैं जो कलीसिया जाने से या बाईबल पढ़ने से इंकार करते हैं | कितना भी कठिन यह क्यों न हो, विश्वासी होने का दावा करने वाले व्यक्ति को परमेश्वर की बातों के लिए प्रायोगिक रूप से जितना संभव हो उतना अधिक से अधिक समय देने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास करने के लिए संघर्षरत रहना चाहिए |
कई वर्ष पूर्व ड्वाईट हिल्स नामक एक पासबान थे | एक बार उन्होंने एक सुन्दर लड़की का अंतिम क्रियाकर्म किया | यह लड़की प्रभु के दिन सैर सपाटे में गई थी और उस दिन एक वाहन दुर्घटना में उसकी मौत हो गई | मेहमानों को विदा करते समय उस लड़की का पिता मेहमानों की ओर मुड़ता है और रुंधे गले से कहता है, “हमने अपने रविवार को गोल्फ खेलते हुए और अन्य मनोरंजक गतिविधियों में सम्मिलित होते हुए बिताया | हमारे बच्चों ने हमारे पदचिन्हों का अनुसरण किया और उन्होंने हमें पीछे छोड़ दिया | मेरे पुत्र के कारण मैं बदनाम हुआ और मेरी बेटी की मौत हो गई | मैं आपको बताना चाहता हूँ कि परिवार के पालन – पोषण करने का एक ही तरीका है और वह है सन्डे – स्कूल और कलीसिया में उनका पालन – पोषण करना | मैं जानता हूँ मैं क्या बोल रहा हूँ |”
मैं दोहराता हूँ : पालकगणों, हम हमारे बच्चों के लिए क्या आदर्श रख रहे हैं ? आईए प्रभु के दिन को लाभ और मजा के इन वेदियों पर बलिदान न करें | इसके स्थान पर आवश्यकता है कि हम प्रभु और उसके लोगों के प्रति प्रेम को अनुमति दें कि वह हमें प्रभु के दिन को उसके दिन के रूप में आदर देने के लिए प्रेरित करे |
इतना कहने के पश्चात, अगले लेख में हम कुछ ऐसे सुझावों को देखेंगे जो मैं आशा करता हूँ कि एक व्यक्ति की सहायता करेंगे कि वह प्रभु के दिन को उस रीति से आदर दे जिस रीति से आदर दिया जाना चाहिए |
परन्तु जब तक लाभ और मजा के इन शत्रुओं ( पापों ) को मौत के घाट उतारने का एक पवित्र संकल्प न लिया जाए तब तक प्रायोगिक सुझावों से ( फिर चाहे वे गिनती में कितने भी क्यों न हों ) कोई सहायता नहीं मिल सकती है | जब तक प्रभु के दिन उसकी आराधना करने का एक संकल्प किसी के हृदय को जकड़ न ले तब तक यह नहीं होगा | इसलिए यदि आपके पास अब तक यह संकल्प नहीं है तो क्यों न ऐसे एक संकल्प के लिए उत्साहपूर्वक प्रार्थना करें?
