हमारे परमेश्वर पिता द्वारा गोद लिए जाने ( लेपालकपन ) की 4 आशीषें

Posted byHindi Editor July 9, 2025 Comments:0

(English version: 4 Blessings of Being Adopted by God Our Father)

जिस प्रक्रिया के द्वारा परमेश्वर हमें, उसे “पिता” कहकर संबोधित करने के योग्य बनाता है, उस प्रक्रिया को बाईबल “लेपालकपन ( गोद लेना ) नाम देती है | यह हमें मिला हुआ सर्वोच्च विशेषाधिकार है – धर्मी ठहराए जाने से भी बढ़कर |धर्मी ठहराया जाना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अपने पापों से मन फिराने और यीशु मसीह पर विश्वास करने पर, परमेश्वर हमें हमारे दोष से मुक्त करता है | धर्मी ठहराया जाना एक वैधानिक शब्द है जो परमेश्वर को एक न्यायी के रूप में देखता है | इसका संबंध, परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था के सम्मुख हमारी स्थिति से है |

वहीं दूसरी ओर लेपालकपन ( गोद लेना ) एक पारिवारिक बात है | एक लेखक के अनुसार, “लेपालकपन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर हमें अपने परिवार का सदस्य बनाता है |” लेपालकपन परमेश्वर को एक पिता के रूप में देखता है, और इस प्रकार यह समीपता, स्नेह, और उदारता की ओर संकेत करता है | एक अन्य लेखक ने कहा, “न्यायी परमेश्वर के साथ सही संबंध होना एक बड़ी बात है, परन्तु परमेश्वर पिता द्वारा प्रेम और परवाह पाना बहुत ही बड़ी बात है |” इस विचार को बेहतर रीति से समझने में निम्नलिखित उदाहरण से सहायटा मिलेगी :

मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने आपके पुत्र की हत्या कर दी और उसे बंदीगृह में डाल दिया गया, जहाँ वह मृत्युदण्ड की प्रतीक्षा में है | आप उस व्यक्ति को क्षमा कर देते हैं और उसे स्वतंत्र कर देते हैं | यह कार्य  ही अपने आप में एक महान बात होगी | परन्तु आप वहीं रुकते नहीं हैं |उस व्यक्ति के बंदीगृह से छूटने के पश्चात आप उस हत्यारे को गोद ले लेते हैं और उसे अपना पुत्र बना लेते हैं और उसे वे समस्त विशेषाधिकार दे देते हैं जो आपके पुत्र के पास होते ! ये कैसा लगेगा ? लोग आपको पागल भी कह सकते हैं ! परन्तु यह कार्य आपके प्रेम की ऊँचाई को दिखायेगा ! और न केवल उतना बल्कि यह उस व्यक्ति को प्राप्त आशीष की भी ऊँचाई को दिखायेगा जिसने आपके बहुमूल्य पुत्र को मार डाला |

क्या यह धर्मी ठहराए जाने और लेपालकपन का बाईबल – सम्मत चित्र नहीं है ? परमेश्वर धर्मी ठहराए जाने के कार्य को करने के पश्चात रुक सकता था | परन्तु वह नहीं रुका | धर्मी ठहराए जाने की आशीष के ऊपर, उसने हमें उससे भी एक बेहतर आशीष दी – लेपालकपन, जिसके द्वारा उसने हमें अपना पुत्र और पुत्री बनाया है | इसीलिए लेपालकपन, धर्मी ठहराए जाने से कहीं अधिक अविश्वसनीय आशीष है | 

परमेश्वर को पिता के रूप में देखने की अवधारणा पुराना नियम में भी मौजूद था ( निर्गमन 4:22; भजनसंहिता 103:13; यशायाह 64:8 ) | परन्तु, नया नियम में हम परमेश्वर के पितृत्व को एक सम्पूर्ण अर्थ में देखते हैं क्योंकि नया नियम में लेपालकपन की अवधारणा अधिक स्पष्टता से प्रगट की गई है | जिस शब्द का अनुवाद ‘लेपालकपन ‘ के रूप में किया गया है, वह 5 बार आया है – और इसका सारा प्रयोग पौलुस की पत्रियों में हुआ है ( रोमियों 8:15,23; 9:5; गलातियों 4:5; इफिसियों 1:5 ) |  

परमेश्वर ने हमें इसलिए गोद नहीं लिया क्योंकि उसे कुछ जरूरत थी या उसने हममें कुछ ऐसा अच्छा देखा जो उसे लाभ पहुँचा सकता था | हममें तो उसे बस ऐसे विद्रोही दिखाई पड़े जिन्होंने उसकी ओर पीठ फेर रखी थी | तौभी उसने हमें गोद लिया क्योंकि उसने ऐसा करने का चुनाव किया – अपने विशुद्ध प्रेम के कारण ( इफिसियों 1:4 – 5 ) | ऐसा प्रेम मानवीय समझ के परे है !

और ऐसा प्रेम जो हमारे गोद लिए जाने के कार्य को संपादित करता है, कम से कम 4 प्रायोगिक आशीषें लाता है |

आशीष # 1. लेपालकपन, हमें परमेश्वर को हमारा पिता कहने के योग्य बनाता है |  

यीशु मसीह ने परमेश्वर को पिता के रूप में संबोधित करते समय, अब्बा, पिता” कहकर पुकारा ( मरकुस 14:36 ) | हम भी परमेश्वर को हमारे अन्दर निवास करने वाले पवित्र आत्मा के माध्यम से, अब्बा, पिता” बुला सकते हैं ( गलातियों 4:6 ) | अब एक अद्भुत नया रिश्ता बन चुका है जो अनंतता तक बना रहेगा | हमें प्यार किया जाता है, हमारा ध्यान रखा जाता है और हम हमारे इस अद्भुत स्वर्गीय पिता से कभी भी अलग नहीं होंगे ! 

आशीष # 2. लेपालकपन, हमारे प्रार्थना जीवन को समृद्ध बनाता है |  

यीशु मसीह ने हमें सिखाया कि हम प्रार्थना करते समय परमेश्वर को “हे हमारे पिता तू जो स्वर्ग में है” कहकर संबोधित करें ( मत्ती 6:9 ) | यह घनिष्ठता हमें योग्य बनाती है कि हम हमारे पिता परमेश्वर के पास हमारे समस्त निवेदनों के साथ पहुँचें क्योंकि वह हमारी चिंता करता है | हम चिंता से मुक्त हो सकते हैं | हम अपराध – बोध से मुक्त हो सकते हैं | जब हम अपने पापों का अंगीकार करते हैं तो वह हमारे समस्त पापों को क्षमा करता है | एक प्रेमी पिता, सदैव अपनी संतानों की प्रार्थना सुनता है |

आशीष # 3. लेपालकपन, भविष्य के लिए हमारी आशा को दृढ़ करता है |  

पौलुस रोमियों 8:23 में हमें बताता है कि, हम लेपालक होने की, अर्थात अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं |” उसने आगे अपनी बात जारी रखते हुए कहा, 24 आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है परन्तु जिस वस्तु की आशा की जाती है जब वह देखने में आए, तो फिर आशा कहाँ रही ? क्योंकि जिस वस्तु को कोई देख रहा है उस की आशा क्या करेगा ? 25 परन्तु जिस वस्तु को हम नहीं देखते, यदि उस की आशा रखते हैं, तो धीरज से उस की बाट जोहते भी हैं | सार रूप में, पौलुस यह कह रहा है कि लेपालकपन का सम्पूर्ण अनुभव भविष्य में मिलेगा जब हम महिमित देह को पायेंगे और तब तक हम इस वर्तमान जीवन के परीक्षाओं को दृढ़ आशा के साथ सहते हैं | 

2 कुरिन्थियों 1:22 के अनुसार, परमेश्वर ने “बयाने में आत्मा को हमारे मनों में दिया |“. “बयाने में”, वाक्याँश इस सच्चाई की ओर संकेत करता है कि हम भविष्य में प्रभु के साथ अनंतता तक हमारी महिमित अवस्था में रहेंगे | यह सच्चाई भी हमारी आशा को दृढ़ करती है | 

आशीष # 4. लेपालकपन, हमें परमेश्वर द्वारा प्रशिक्षित होने के योग्य बनाता है |  

इब्रानियों 12:5 – 6 कहता है, 5 … हे मेरे पुत्र, प्रभु की ताड़ना को हलकी बात न जान, और जब वह तुझे घुड़के तो हियाव न छोड़, 6 क्योंकि प्रभु, जिस से प्रेम करता है, उस की ताड़ना भी करता है; और जिसे पुत्र बना लेता है, उस को कोड़े भी लगाता है |” और फिर लेखक आगे बढ़ता है और कहता है, तुम दुख को ताड़ना समझकर सह लो: परमेश्वर तुम्हें पुत्र जान कर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है ( इब्रानियों 12:7 ) | सार रूप में कहें तो, इब्रानियों की पत्री का लेखक कह रहा है कि चूँकि हम परमेश्वर की संतान हैं, इसीलिए परमेश्वर हमारी ताड़ना करता है | और यह एक अच्छी बात है ! यह दर्शाता है कि हम उसके बच्चे हैं ! ताड़ना करने की इस प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य इब्रानियों 12:10 में बताया गया है, कि हम भी उस की पवित्रता के भागी हो जायें |” 

हमारी प्रतिक्रिया :

लेपालकपन के इन 4 लाभों के प्रकाश में ( कई और भी जोड़े जा सकते हैं ), हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए ? यह एक सरल प्रश्न है | हमें “हमारे पिता परमेश्वर का अनुकरण करना” है | यदि हम उसके पुत्र और पुत्रियाँ हैं तो हमें पारिवारिक समानता दिखना चाहिए ! और इसका अर्थ यह है कि हमें पवित्रता का अनुसरण करना है क्योंकि परमेश्वर पवित्र है ( 1 पतरस 1:15 – 16 ) | हमें वैसा ही प्रेम करना है जैसा परमेश्वर करता है ( इफिसियों 5:1 – 2 ), एक ऐसा प्रेम जो हमारे शत्रुओं तक भी पहुँचता है ( मत्ती 5:44 – 45 ) |

परमेश्वर के संतानों को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक परिवार हैं | और इसका अर्थ यह है कि कड़वाहट, जलन और लड़ाई के लिए कोई स्थान नहीं है | हम आनंद और दुःख में भागीदारी दिखाते हैं | यदि इस संसार में रहने वाले पिता असफल भी हो जायें ( और वे होंगे ), आईए इस बात को जानने में हम विश्राम पायें कि परमेश्वर के रूप में क्या ही एक प्रेमी पिता हमारे पास है | और उसके परिवार में गोद लिए जाने के कारण क्या ही महिमावान भविष्य हमारा है ! ये सच्चाईयाँ हमारे पिता का अनुकरण करने के लिए हममें एक पवित्र संकल्प उत्पन्न करने वाले प्रेरक बनने चाहिए ! 

और यदि आप परमेश्वर की संतान नहीं है और अब भी आप उसे अपना पिता नहीं कह सकते हैं, तो आज का दिन इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक अच्छा दिन होगा | अपने पापों से मन फिराने और यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता एवं प्रभु के रूप में गले लगाने पर आप उसके परिवार में लेपालक रूप में ( गोद्पुत्र के रूप में ) स्वीकार किए जाते हैं | यूहन्ना 1:12 में हमें इस महिमित और साँत्वनादायक सत्य को बताया गया है, परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं | यदि परमेश्वर के अनुग्रह से आप उसके प्रेममय आमंत्रण के प्रति प्रतिक्रिया दिखाते हैं तो आप भी लेपालकपन के इन लाभों का आनंद उठा सकते हैं ! 

अतः, झिझकना छोड़िए | कृप्या आईए | परमेश्वर के पास अपने परिवार में और भी संतानों के लिए सदैव ही स्थान उपलब्ध है ! मानवीय पिताओं में कमजोरियां होती हैं और वे अक्सर असफल होते हैं | परन्तु, एकमात्र और अद्वितीय स्वर्गीय पिता में – प्रभु यीशु मसीह के पिता में कोई कमी नहीं है | वह आपको कभी भी निराश नहीं करेगा | वह आपको सिद्ध प्रेम से सम्पूर्ण अनंतता तक प्रेम करेगा ! 

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